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author Nijamul Oct 03, 2025 10 min

मुस्लिम समाज में ऑनलाइन चंदे का बढ़ता प्रचलन

मुस्लिम समाज में ऑनलाइन चंदे का बढ़ता प्रचलन

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मुस्लिम समाज में ऑनलाइन चंदे का बढ़ता प्रचलन

आजकल सोशल मीडिया पर एक नया चलन बहुत तेज़ी से फैल रहा है – ऑनलाइन चंदा (Donation/Fundraising)।
फेसबुक ग्रुप, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कुछ लोग गरीबों और मज़लूमों की मदद के नाम पर चंदा वसूलते हैं। यह लोग अक्सर अपने संगठन को “NGO” के रूप में पंजीकृत (रजिस्टर्ड) बताते हैं ताकि लोगों को उन पर विश्वास हो जाए। तस्वीरें और वीडियो में गरीब बच्चों, बीमार मरीजों या तंगहाली झेल रहे परिवारों को दिखाया जाता है, ताकि लोगों की भावनाएँ उभरें और वे तुरंत पैसे भेज दें।
लेकिन हक़ीक़त यह है कि चंदे के नाम पर दिया गया आपका यह पैसा ज़रूरतमंद तक नही पहुँचता , बल्कि इन्हीं ग्रुप्स के एडमिन्स और मोडरेटर इसी पैसे से अपनी ज़िंदगी गुज़ार रहे होते हैं , अपना पेट पाल रहे होते हैं। और अब इस तरह का काम धीरे-धीरे एक “कमाई का ज़रिया” बन गया है, न कि इंसानी भलाई का काम।

• समस्या कहाँ है ?

समाज की भावनाओं का इस्तेमाल
ये लोग लोगों के दिलों और जज़्बात के साथ खेलते हैं। इंसान जब किसी गरीब, अनाथ या बीमार इंसान को देखता है तो उसका दिल पसीज जाता है। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर ऑनलाइन चंदा माँगने वाले लोग झूठी या आधी-अधूरी कहानियाँ बना लेते हैं।
• कभी कहते हैं “इस बच्चे की पढ़ाई रुक जाएगी अगर आप मदद न करें”।
• कभी दिखाते हैं “बीमारी से जूझ रहे मरीज को तुरंत ऑपरेशन की ज़रूरत है”।
• कई बार तो भावनात्मक वीडियो और तस्वीरों को बार-बार शेयर किया जाता है ताकि लोग बिना सोचे-समझे पैसे भेज दें।
असलियत में यह “जज़्बात का शोषण” है, जिसमें नेक नीयत इंसानों को ठगा जाता है।

गरीबों की तस्वीरें और मजबूरी का दिखावा
सोशल मीडिया पर अक्सर गरीब बच्चों की तस्वीरें, बीमार लोगों की रिपोर्ट, या तंगहाली झेलते परिवारों की हालत दिखाकर लोगों से पैसा माँगा जाता है।
• कुछ तस्वीरें असली होती हैं, लेकिन उनका मालिकाना हक़ उन्हीं लोगों के पास नहीं होता जो चंदा माँग रहे हैं। यानी वे बस इंटरनेट से या किसी और ग्रुप से उठाई हुई फोटो इस्तेमाल करते हैं।
• बहुत बार एक ही तस्वीर या वीडियो कई अलग-अलग पेज और ग्रुप में “अलग-अलग नाम” और “अलग-अलग कहानियों” के साथ घूमती रहती है।
• इस तरह की हरकतें असली ग़रीबों की इज़्ज़त और प्राइवेसी को भी नुक़सान पहुँचाती हैं, क्योंकि उनकी तस्वीरों को कारोबार की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

नेक काम का कारोबार बन जाना
चंदा इकट्ठा करने की यह प्रथा धीरे-धीरे एक “धंधा” बन चुकी है।
• शुरुआत में लोग कहते हैं “सिर्फ गरीबों की मदद करनी है” लेकिन बाद में यही चंदा उनकी अपनी ज़िंदगी चलाने का ज़रिया बन जाता है।
• NGO का नाम लेकर या धार्मिक भावनाओं के सहारे बड़ी-बड़ी रकम जुटाई जाती है, लेकिन उसका हिसाब किसी को नहीं दिया जाता।
• नतीजा यह होता है कि मासूम मुसलमान, जो अल्लाह की राह में नेक नीयत से अपनी मेहनत की कमाई खर्च करते हैं, वे ठगे जाते हैं और असली हक़दार तक मदद पहुँचती ही नहीं।
• धीरे-धीरे यह “इबादत” और “ख़िदमत” की जगह एक तरह का नकली कारोबार बन जाता है।

• इसके नुक़सान

रोज़गार पर असर और विश्वास की कमी
कई मेहनतकश मुसलमान अपनी मेहनत की कमाई से नेक नीयत से चंदा देते हैं। लेकिन जब यह पैसा गलत हाथों में चला जाता है तो.वह रकम असली काम या कारोबार में लगाने के बजाय बर्बाद हो जाती है इस तरह ठगी सिर्फ धोखा नहीं बल्कि लोगों की कमाई पर असर डालती है।
जब लोग बार-बार ठगी का शिकार होते हैं तो उनका भरोसा धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। फिर जब कोई असली ज़रूरतमंद  मदद माँगता है, तो लोग उस पर भी शक करने लगते हैं। यह सबसे बड़ा नुकसान है क्योंकि असली ग़रीब और मजलूम, जो सचमुच मदद के हक़दार हैं, उन्हें भी मदद मिलना मुश्किल हो जाता है।

भेड़चाल की मानसिकता
सोशल मीडिया पर सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोग बिना जाँच-पड़ताल किए सिर्फ यह सोचकर पैसे भेज देते हैं कि “सब दे रहे हैं तो मैं भी दूँ।”
• कोई भावनात्मक पोस्ट या वीडियो आते ही लोग तुरंत UPI/Paytm से पैसे ट्रांसफर कर देते हैं।
• बाद में न तो पूछते हैं कि पैसा कहाँ गया और न ही सबूत मांगते हैं।
यह भेड़चाल एक तरह की सोचने-समझने की आदत खत्म कर देती है और धोखेबाज़ों के लिए आसानी से “कमाई का जरिया” बन जाती है।

धार्मिक भावनाओं का शोषण
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह लोग अल्लाह के नाम और सदक़ा/ज़कात की भावना का गलत इस्तेमाल करते हैं।
• लोगों को डराया जाता है कि “अगर आपने मदद नहीं की तो गुनाह होगा।”
• कुरआनी आयतों या हदीसों का हवाला देकर लोगों को तुरंत देने पर मजबूर किया जाता है।
• असल में यह धर्म और इंसानियत दोनों का मज़ाक है, क्योंकि अल्लाह के नाम को “धंधा” बनाने से समाज की आस्था को गहरी चोट पहुँचती है।

• क्या करें?

किसी भी तरह के ऑनलाइन चंदा देने से दूरी बनाये 
आजकल ऑनलाइन ठगी के सबसे आसान तरीकों में से एक है – झूठी मदद की अपील करना। इसलिए जब भी कोई लिंक, QR कोड, या अकाउंट नंबर आपके पास आए, तो तुरंत पैसे भेजने की जल्दी न करें।
• पहले यह देखें कि वह अपील असली है या नकली।
• इंटरनेट पर उस तस्वीर/वीडियो को सर्च करें, कहीं यह पहले से घूम रही तो नहीं?
• NGO या संस्था का नाम असली है या सिर्फ़ दिखावे के लिए बनाया गया है पहले इसकी सही जानकारी लें

देखें कि पैसे का इस्तेमाल कहाँ और कैसे होगा
किसी भी चंदे का असली मक़सद साफ़ होना चाहिए।
• यदि किसी बच्चे के इलाज के लिए माँगा जा रहा है तो अस्पताल की रिपोर्ट और डॉक्टर की लिखित सलाह होनी चाहिए।
• अगर किसी गरीब परिवार के लिए माँगा जा रहा है तो उसका पता, नाम और हालात स्पष्ट होने चाहिए।
• मदद की अपील करने वाले से साफ़ पूछें कि यह पैसा कहाँ इस्तेमाल होगा और किसके पास जाएगा।

रसीद, रिपोर्ट और पारदर्शी हिसाब-किताब माँगें
असली और नेक नीयत संस्थाएँ हमेशा रसीद (Receipt) और रिपोर्ट (Report) देती हैं।
• यदि NGO है तो उसका रजिस्ट्रेशन नंबर, 80G/12A सर्टिफिकेट, ऑडिट रिपोर्ट सब दिखाएँगे।
• जो संस्था हिसाब देने से कतराती है, समझ लें कि मामला संदिग्ध है।
• याद रखिए, जहाँ पारदर्शिता नहीं है, वहाँ भरोसा करना खतरनाक है।

सीधे ज़रूरतमंद तक पहुँचाएँ – बीच में किसी “ठेकेदार” पर भरोसा न करें
मदद का सबसे अच्छा तरीका है कि बीच का बिचौलिया हटाकर आप सीधे ज़रूरतमंद तक पहुँचे।
• अगर आपके मोहल्ले, मस्जिद या रिश्तेदारी में कोई गरीब है तो सीधे उसकी मदद करें।
• बीच में ठेकेदार या एडमिन रखने से अक्सर पैसा वहीं अटक जाता है और गरीब तक सही तरह नहीं पहुँचता।
• यह तरीका न सिर्फ़ सुरक्षित है बल्कि दिल को सुकून भी देता है कि “मेरी मदद सही हाथों में गई।”

अपने ज़कात, सदक़ा या मदद को विश्वसनीय संस्था या सीधे परिवार तक पहुँचाएँ
इस्लाम ने ज़कात और सदक़ा के लिए साफ़ दिशा-निर्देश दिए हैं।
• यह फर्ज़ है कि यह रकम सिर्फ़ हक़दार तक पहुँचे।
• हमेशा ऐसी संस्था चुनें जो समाज में जानी-मानी हो और जिसका रिकॉर्ड साफ़ हो।
• सबसे अच्छा तरीका है कि अपने आस-पास किसी गरीब परिवार, अनाथ बच्चे, विधवा और बीमार इंसान तक सीधे अपनी मदद पहुँचा दें।

इससे न ठगी होगी, न शक रहेगा, और अल्लाह की रज़ा भी हासिल होगी।

• संदेश
मुस्लिम समाज का असली सुधार कभी भी चंदाख़ोरी या झूठे दिखावे से नहीं होगा। समाज की तरक्क़ी का रास्ता केवल तीन चीज़ों से निकलता है – इल्म, मेहनत और आपसी भरोसा। जब तक हम शिक्षा को तरजीह नहीं देंगे, मेहनत को अपनी पहचान नहीं बनाएँगे और आपस में भरोसा कायम नहीं करेंगे, तब तक कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
अपनी मेहनत की कमाई को वहाँ खर्च कीजिए जहाँ असली मदद हो। अगर किसी गरीब, अनाथ, विधवा या बीमार को मदद की ज़रूरत है तो अपनी रकम सीधे उन्हीं तक पहुँचाइए। किसी ऐसे व्यक्ति या संगठन पर आँख बंद करके भरोसा मत कीजिए जो केवल बड़े-बड़े दावे और नारे लगाता है लेकिन उसका कोई साफ़ सबूत या हिसाब नहीं दिखाता। असली मदद वहीं है जो सीधे ज़रूरतमंद तक पहुँचे और जिसका असर समाज में नज़र आए।
भेड़चाल से बचना हर इंसान की जिम्मेदारी है। सिर्फ इसलिए कि “सब दे रहे हैं, तो मैं भी दे दूँ” यह सोच समझदारी नहीं है। अपने दान, ज़कात या सदक़ा को देने से पहले अच्छी तरह जाँच-पड़ताल कीजिए। ठगी और धोखाधड़ी के नए-नए तरीक़ों से होशियार रहना ही समझदारी है। वरना नेक नीयत से दी गई रकम भी ग़लत हाथों में जाकर बर्बाद हो जाएगी और असली हक़दार तक कभी नहीं पहुँचेगी।
गरीबों की मदद करना इंसानियत और ईमान दोनों की मांग है। लेकिन याद रखिए, मदद का हक़दार वही है जो सचमुच ज़रूरतमंद है। इसलिए मदद कीजिए, लेकिन चंदाख़ोरी के जाल से बचकर। नेक काम को कारोबार बनाने वालों से दूरी बनाए रखना ही समाज के लिए सबसे बड़ा सुधार है।

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